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Thursday, 10 November 2011

क्षणिकाएं



=॥= १ =॥=
"तुम बिन"

तुम बिन
अकेली शाम के
डूबे हुए सूरज ने बोला
मैं भी विरह की आग में
जलता रहा हूँ
दिन भर चहेती चाँदनी की चाह में
फ़िरता रहा
फ़िरता रहा हूँ ॥


=॥= २ =॥=
"बिन तुम्हारे"

हज़ारों ख्वाहिशें
पूरी हुईं
एक बस
तुमको ही मैं ना पा सका
और जब तुम ही नहीं हो
पास मेरे
सब कुछ ही मेरे पास है
तो किस लिये है ?
किस के लिये है ?

सम्पूर्णता मेरी
थीं तुम,
बिन तुम्हारे
पात बिन तरु की तरह,
रेत बिन मरु की तरह ,
शैल बिन मेरु की तरह
हो गया हूँ,
क्या कहूँ,
क्या-क्या न खुद का
खो गया हूँ ।


   =॥= ३ =॥=

    "उस रोज़"


उस रोज़
जब छू कर गई
चंचल हवा,

उस रोज़
केसर की कली सी शाम
जब मुसका उठी,

उस रोज़
सूने रास्ते ने टोक कर
मुझसे कहा,

फ़ूलों में, तितली में,
फ़िज़ां में ढूँढ़ते हो
जो सजीले रंग, चटकीले

अपने दामन में ही
ढूँढ़ो, उस रंगरेज़ का मकाँ
अपने सपनों में भी भर लो
इन्द्रधनु का आसमाँ

            --- आशुतोष कुमार झा














Monday, 3 October 2011

एक ग़ज़ल

इस  तरह  खुदगर्ज़ ना बन जाइए ।
माल बहुत है ज़रा धीरे-धीरे खाइए ॥

जल जाए दिल्ली या मुम्बई जाए दहल।
आप  अपनी-अपनी  रोटियाँ  पकाइए ॥

दर्द  होता है दिल का  दुश्मन हुज़ूर ।
हमारी दुश्वारियाँ दिल से न लगाइए ॥

कैसे  जाएगी  गुलदस्तों  की  रवायत ।
आप लीजिये और इन्हें भी दिलवाइए ॥

खेत-माटी, खाद-पानी, गाँव,  भारत-भारती ।
आप इण्डिया की सोचिये, शेष भूल जाइए ॥

सरकार के सालार,  पगड़ी में रहें, बेशक ।
अर्ज़ बस इतनी, हमें, टोपी मत पहनाइए ॥

सरकार चलाने का हुनर जानने वालों ।
पंजे को बक्शिये, थप्पड़ मत बनाइए ॥

हर पाँच साल बाद करती है फ़ैसला ।
जनता नहीं गूंगी,  मत  सितम ढ़ाइए ॥

आप ने समझा हमें गाफ़िल,  इनायत ।
कल का मेन्यू मैडम जी से पूछ आइए ॥

बर्बाद कर दिया चमन को बागबां ने खुद।
अब तो  कलियों  पे  ज़रा  तरस  खाइए ॥

      ---आशुतोष कुमार झा



 

एक ग़ज़ल

आपकी महफ़िल में आना चाहता हूँ ।
खुदगर्ज़  तनहाई भुलाना चाहता हूँ ॥

सर्द  मौसम  की  सुबह कांपते लब से ।
प्यार का गुनगुना गीत गाना चाहता हूँ ॥

शाख  से  टूट  कर  बिखर गया कैसे ।
एक पत्ते की दासताँ सुनाना चाहता हूँ ॥

बेड़ियाँ  मेरे  पाँवों की जानती हैं सबब ।
मैं आसमां के उस पार जाना चाहता हूँ ॥

लौट आए वफ़ा का मौसम तो  कहना ।
मैं इन्तज़ार का कोई बहाना चाहता हूँ ॥

पास  खंज़र  नहीं  तेरे  पर  सच  ये है ।
इन्हीं हाथों से कोई ज़ख्म खाना चाहता हूँ ॥

इश्क किसी से और कयामत किसी पर ।
मैं राहे वफ़ा का सच दिखाना चाहता हूँ ॥

तुम्हारी  हसरतों  के  पर, मेरा आसमाँ ।
मैं क्या कहूँ, कितना कमाना चाहता हूँ ॥

बया का घोंसला भी कम नहीं जन्नत से ।
मैं दरख़्त के साये में  ठिकाना चाहता हूँ ॥

किन हाथों दिल का साज़ रख दिया मैंने ।
उठती है टीस जब भी बजाना चाहता हूँ ॥

            --- आशुतोष कुमार झा







Tuesday, 27 September 2011

गुनगुनाइए

एक गीत

ख्वाबों में अकसर बुनता था
हर्फ़ों   के   मोती   चुनता  था
गीत  वही  अपने  किस्से  का
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं ॥


सागर  तल  पर  रेती  बिखरे
नील गगन पर बादल निखरे
लहरों  का आना और जाना
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं॥


बरस  पुरानी  बात  हो  गई
चेहरे  पर   बरसात   हो  गई
कितनी कलियाँ,कितने पत्ते
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं॥


तनहा  रात  चली  आती  अब
छत पर अकसर सो जाती अब
तारों  से  तरकीबी  बातें
याद नहीं,कुछ याद नहीं॥


कमरा  खाली , मुँह  पर जाली
इस  उपवन  का  कोई न माली
कितने  पाँव  रौंद  कर  निकले
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं  ॥


किस  सूरज  को  याद   करूं
किस चन्दा से फ़रियाद करूं
आसमान कब गिरवी रक्खा
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं॥


हुस्न का मौसम फिर कर आया
रंग  एक  ना  मुझको  भाया
सोहबत में कितने दिल टूटे
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं॥



दिल जाने किस की याद में रोता
कौन  किसी  का  अपना  होता
लैला - हीर  के  झूठे  किस्से
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं॥


         ---आशुतोष कुमार झा














 

Tuesday, 20 September 2011

विदा होते बरसात को

रस सिक्त 
कर गए 
हर रिक्त 
झमाझम बरसा कर 
संगीत  |
दिन गए विगत
अलसाए .....
कुम्हलाए प्रणय में बीत |


तुम आए
श्याम सखा बन कर
खेला नभ में जी भर
अंजुली न खाली छोड़ी
पत्तों - शाखों में 
मद - मदन्त
ज़बरन
अंकित किया
जलद का
चुम्बन अनंत |


भेजा अमोल उपहार
कृषक के जीवन में
अंकुर अशेष 
मल्हार |


अब विदा ले रहे
कहें, रुक जाओ
मत ही जाओ
बहुत बाकी हैं बातें
जन मन की
किन्तु यह हठ होगी |


पलकें देखेंगी राह
फिर अगले साल
आखेट पर आना
नव श्रृंगार कर के आना 
न चलेगा कोई बहाना
जल्दी ही आना
शुभ विदा प्रिय जलद - कुञ्ज










             ---- आशुतोष कुमार झा



Friday, 16 September 2011

अक्षर अनंत: २३ सितम्बर , भगत सिंह जयन्ती पर विशेष

अक्षर अनंत: २३ सितम्बर , भगत सिंह जयन्ती पर विशेष: पुनर्जन्म आज याद करते हुए तुम्हें, तुम्हारी जयन्ती पर स्वीकारता हूँ दो टूक कि तुम्हारे बाद न रख सके हम जलाए- क्रांति का ज्वाल, चेत...

२३ सितम्बर , भगत सिंह जयन्ती पर विशेष

पुनर्जन्म


आज
याद करते हुए
तुम्हें, तुम्हारी जयन्ती पर
स्वीकारता हूँ दो टूक
कि तुम्हारे बाद
न रख सके हम
जलाए- क्रांति का ज्वाल,
चेतना की मशाल
माँगती थी रक्त
और नहीं, बिल्कुल नहीं था
वक़्त
हमारे पास ।


काल के पहिये की चाल
हो चली थी तेज़,
बहुत तेज़
और उसी पहिये से चिपक कर
देश-दुनिया भूल कर
विकास और तरक्क़ी के पंख तोल कर
अमेरिकी घोंसलों में
जा चुके थे हम
अपनी धरती छोड़ कर ।
तरुणाई की उमंगें,
बदलाव की चाहत
और
एक खूबसूरत दुनिया के सपने
खो कर ।
जाने इतिहास की किस गुहा में
हो चुके थे गुम
कभी के---
             तुम्हारी शहादत बिसारकर ।



इतिहास की किताबों में
कुछ हर्फ़ तुम्हारे नाम ---
             कुछ मूर्तियाँ , स्मारक
             और व्याख्यान ।
अब इसी तरह
याद रखना चाहते हैं हम ।


तुम्हें अपनी क्रांतिकारिता के साथ
हमारी चेतना में
दाखिल होने के पहले ही ,
बदल देंगे अपना रास्ता हम
क्योंकि
तुम्हारा रास्ता तो जाता है
सीधे कैदखाने और फ़ाँसी की ओर ।


जैसे-जैसे बदल रहा है
            देश अपनी अस्मिता

न्याय के लिये- संघर्ष
प्रतिरोध के लिये- साहस
अधिकार के लिये- तेवर
और
जन मानस का जुझारुपन
            बदल रहे हैं निरन्तर---
            अपनी परिभाषाएं ।


परिवर्तन के लिये उठते हाथ
             जड़ने लगे हैं
             अपने महलों में सोने की शहतीर ।

आस्था के गुम्बद
            और आसमान छूती अट्टालिकाएं
दे रही हैं नित-निरंतर
            धर्म और विश्वास को नया आयाम
विकास के मौजूदा मॉडल को
             स्वीकृति का पैग़ाम ।


ऐसे में बड़ा मुश्किल है
           यह स्वीकार करना
           कि सन सैंतालिस में
           अंग्रेज़ देश छोड़ गये थे
या
           बदल कर अपने चेहरे का रंग
           ज़्यादा क्रूर, असंवेदनशील,
           फ़ूट डालने में माहिर
           पूंजीवादी लोकाचार
           के असभ्य पैरोकार
           भ्रष्टाचार के असंख्यावतार
हो कर
चिपक गए थे
हमारी किस्मत बन कर ।


हमने तुम्हारे बलिदान को
फ़िल्मी कथाओं में तब्दील कर दिया
जनता के पक्ष में उठती
तुम्हारी हर इक आवाज़ को
रौंद डाला- तेज़ फ़िल्मी धुनों तले ।

ऐसे में तुम्हारे कथन
       " मैं नास्तिक क्यों हूँ "
और
       " बम का दर्शन "
बन गए हैं अनजान भाषा के शब्द
जिनमें सिर खपाना कोई नहीं चाहता ।


लाल रंग देखते ही
थम-सहम जाना
इस कदर शुमार हो गया है
हमारी आदतों में
कि अपने लहू,
तुम्हारी शहादत
और क्रांति के परचम से
सहमते हुए,
हर संभव दूरी बनाते हुए
देख रहे हैं इसे--
            बस ट्रैफ़िक सिग्नल की तरह
           ’हरी’ होने का इन्तज़ार करते हुए ।


श्रद्धांजलि की
रस्मी संजीदगियाँ भी
सिमट गई हैं--
राजघाट से शक्तिस्थल तक ।

सत्ताधीशों के चहेतों का गुणगान
हो रहा है
साप्ताहिक व्रत की पूजा, कथा, आरती की तरह ।


सत्ता का पाखण्ड
            हर दलाल के गुलाल में लिपट कर
            दिल्ली से चौपाल तक पहुँच कर
            शामियाने की तरह
तन गया है
            जहाँ हर ज़ेबकतरे से उम्मीद की जाती है
            कि शामिल हो प्रार्थना सभा में
            पूरी पवित्रता,
            पूरी सादगी,
            पूरी श्रद्धा और
            विनम्रता के साथ ।
गांधी छाप छापने वाले ’हाथ’
पाते हैं गांधी पार्टी का चरित्र प्रमाण पत्र
जनता के हाथों
इन्हीं घाटों और स्थलों के दर्मयान
’राम धुन’ सुनते हुए।

इतने सालों में
सरकारी बही खातों में
अवतरित हो चुके हैं अनगिनत ’महात्मा’
फ़िर आज तुम्हें याद करने की
सचमुच किसे है ज़रूरत ?


खाए-अघाए लोगों ने
बना लिए हैं
अपने-अपने भगत सिंह
अपनी सुविधा के हिसाब से
गढ़ ली हैं
तुम्हारे चरित्र की सीमाएं ।

तुम्हें राष्ट्र नायक मानने में
काफ़ी उलझन है ।
अफ़सोस है
तुम इक्कीसवीं सदी के चलन में
फ़िट नहीं बैठते,
क्योंकि विद्रोह की परम्परा,
सुलगते अंगारों सी विचारधारा,
जनता के पक्ष में अकेले डटने की आदत,
और बलिदान का जज़्बा,
आउटडेटेड मोरल्स हैं
इसलिए महँगी कारों में पीछे
तसवीरें छपवा कर
कुछ लोग आमादा हैं--
तुम्हें सिक्ख बनाने पर ।


तुम नहीं जानते
यह सुपर ब्रांडों का युग है
इसलिए उत्साहित हैं
कुछ सेल्स अधिकारी
क्योंकि निकट भविष्य में
आमूल परिवर्तनवादी मदारी
तुम्हारे नाम पर
विचारधारा की चौपाया दुह कर
सत्ता शिखर तक रेस लगाएँगे
जान भी नहीं पाओगे
मार्क्स के बाद
ये तुम्हारे नाम की सीढ़ी लगाएँगे ।



आज तुम्हें सचमुच याद करने की  
ज़रूरत किसे है ?

जिसे अपदस्थ करना चाहते थे तुम
वह सरकार
नए पहनावे में
दिल्ली की गद्दी पर
काबिज़ है अब तक
अपने आस-पास
ज़ेड प्लस सुरक्षा घेरा बनाए
जनता की इच्छा और
हर वाज़िब माँग पर
झुंझलाती,
लाठी, गोली, गिरफ़्तारी की भाषा में
बतियाती
हाथों पर लगा ताज़ा खून
काफ़ी है यह बताने के लिए
कि एक धुंधला सा अंधेरा है
जम्हूरियत के नाम पर ।


और सचमुच जिन्हें ज़रूरत है
वे यह नहीं जानते,
सचमुच नहीं जानते
कि सौ साल पहले
पैदा हुआ था एक भगत सिंह
उनके हक़ के लिए,
बिल्कुल उन्हीं के लिए
             संसद को हिला डाला था
             बहरी सरकार को
             सोते से जगा डाला था

सज़ा मिली
आवाज़ उठाने की,
चेतना फ़ैलाने की ।
तब अंग्रेज़ी राज था
भयभीत समाज था,
तब भी
चढ़ गया था फ़ाँसी
हँसते-हँसते
बिल्कुल उन्हीं के लिए ।



और ये भी
कि पैदा हो सकता है
दोबारा-तिबारा वही भगत सिंह
उन्हीं में से
आज , एकदम आज के दौर में
बिल्कुल उन्हीं के लिए
            स्वराज के असली सपनों के
            पूरा होने तक ।

अफ़सोस
जनता नहीं जानती ।






        ---- आशुतोष कुमार झा
















































Sunday, 11 September 2011

ऐसा भी एक इंतज़ार

क्षण मुक्तक में ढ़ल गए
दीप- शिखा से जल गए
मैं दहलीज़ न लांघ सका
तुम आते-आते टल गए॥

हिंदी दिवस पर रोया मन

                           1
मुरझाएं क्योंकर  नहीं हिन्दी के बनफ़ूल
गली - गली में खुल गये अंगरेज़ी स्कूल
सरकारें,  तय जानिये,  नहीं  हमारे  साथ
वर्ना सीने पर अपने, गड़ता नहीं ये शूल॥ 


 

                                      2
गांधी बाबा  मर  गये,  आ  न सका  सुराज
नेताओं  में  होड़  मची ,  कैसे  पहनें  ताज
भाषा  में  क़ायम  हुआ  फ़िर अंगरेज़ी राज
चेरी बन हिन्दी रही तब भी बची न लाज॥




                     3
मेल-मिलाप की भाषा हिन्दी
गाँव-समाज की भाषा हिन्दी
आओ नव निर्माण करें ,  हो
राज-काज  की भाषा हिन्दी॥




                 4
इधर-उधर  ना  डोलिए
हिन्दी  में  पर  तोलिए
भाव बढ़े,सम्मान बढ़े
अपनी भाषा बोलिए॥

 



              5
मृदु कंठ गाती भारती
हिन्दी तुम्हारी आरती
शीर्ष तुम जग में बनो
सर्वत्र भारत - भारती॥

 


                    6
वह दिन कभी तो आएगा
इतिहास  बदला  जाएगा
ऊँचा उठा कर शीष भारत
हिन्दी की महिमा गाएगा॥




                                  7
मिटे  न  हिन्दी  अपने  दिल से, मिटे न हिन्दोस्तान ।
बोलें , बरतें  अपनी  भाषा , लौटाएँ  इसका  सम्मान ॥




                             8
अंगरेज़ी  की  दासता  कैसे  आए  रास ।
ना तो मैं अंगरेज़, ना तो किसी का दास॥




                           --आशुतोष कुमार झा






Sunday, 4 September 2011

एक कविता महंगाई के नाम

आये दिन बहार के


दालों की दस्त चालू
चढ़ा   चाँद   आलू
आटे  ने  कहा  बहना,
चावल से बच के रहना
चीनी गयी है सबको
अभी चाँटा मार के
आये दिन बहार के
आये दिन बहार के॥

लहसुन ने की सगाई,
बेटी    हुई   पराई
गोभी ने पटका है सर,
बैंगन  के  उगे हैं पर
प्याज़ गया दर्द का
रिश्ता  उभार  के,
आये दिन बहार के
आये दिन बहार के॥

जब से गरम मसाले,
हल्दी ने बदले पाले
थाली का रंग फ़ीका
मिर्ची का भाव तीखा,
डायटिंग का सोच रक्खो
फ़ीवर   उतार   के
आये दिन बहार के
आये दिन बहार के॥


सरसों ने बदला पाला
डीज़ल ने डाका डाला
क्या रांग है क्या फ़ेयर
महँगाई   टॉप   गेयर
सूली पे चढ़ी जनता
सबको  पुकार  के
आये दिन बहार के
आये दिन बहार के॥


मैडम जी बेदरद हैं
सरदार जी फ़िसड्डी
सरकार  सारी  रद्दी
जबसे  चढ़े  हैं गद्दी,
रख दिया है अपना
कचूमर निकाल के,
आये दिन बुहार के
आये दिन पछाड़ के॥
-- आशुतोष कुमार झा
व्याख्याता, हिन्दी विभाग.
मिसेज़ के.एम.पी.एम.इण्टर कॉलेज.
बिष्टुपुर, जमशेदपुर ८३१००१











Saturday, 3 September 2011

२० मार्च , विश्व गौरय्या दिवस पर विशेष

बहरे समय में वसंत का गीत

झुन्ड के झुन्ड गानेवाली
चहचहाकर विन्दु-समुद्र बनानेवाली
घर-आँगन बसेरा बसाने वाली
नन्ही-सी, भूरी-सी चिड़िया
दिखती नहीं आजकल कहीं
तिनके उठाते हुए,
सिलसिलेवार सजाते हुए,
घोंसला बनाते हुए,
      ढेर सारी चिड़ियाँ
      चहचहाते हुए ।
                  
                   हम आठ फ़ीसदी की दर से
                   विकास कर रहे हैं--
                   भूरी चिड़िया
                   दिखती नहीं आज कल कहीं ;

अगले साल
जब हम विकास दर बढ़ा कर
दस फ़ीसदी पर लाएंगे
क्या पता,
हमीं ग़ायब हो जाएंगे ।

                 आज अचानक
                 तीन गौरय्ये दिख पड़े
                 घर के आहते में
                 मैं भागते हुए घर में घुसा
                 खोल दीं
                 खिड़कियाँ-दरवाज़े सभी...
                  ..... अपना ली
                 स्वागत की मुद्रा
                 -- जहाँ चाहो, घर बना लो
                 विकास के आंकड़ों के ऊँचा-दर-ऊँचा उठते
                 तीर से बचे हुए गौरय्यों--
                 सुनना चाहता हूँ तुम्हारे कंठ से
                 इस बहरे समय में....
                 वसंत का गीत ।


-- आशुतोष कुमार झा
व्याख्याता, हिन्दी विभाग.
मिसेज़ के.एम.पी.एम.इण्टर कॉलेज.
बिष्टुपुर, जमशेदपुर ८३१००१










Sunday, 28 August 2011

सरकार अन्ना से किस भाषा में बात करती है ??

सरकारी भाषा

खेल - तमाशा ,
नीम - बताशा ।
सीधे - ऐड़े  ,
लड्डू - पेड़े ।
उबाल - गरम,
उतार - नरम।
मौसम - भारी,
दुश्मन - यारी।
सुक्खम-दुक्खम,
चप्पल-जूत्तम ।
जलवा - बलवा,
रबड़ी - हलवा।
केश - निखार,
चमन - बहार।
चालू - चमचा,
चिंतन - चर्चा।
दलहन-तिलहन,
बर्तन - बासन।
भूत - भभूत ,
पासा - द्यूत।
तेवर - ज़ेवर ,
तमग़ा - फ़ेवर।
तूम - तड़ाक ,
झूम - झटाक ।
चिड़िया - उड़ ,
चाभी - फ़ुर्र ।
काशी - झांसी ,
कोरट - फ़ांसी ।
कौव्वा - चील ,
चमड़ा - स्टील ।
अन्ना - बन्ना ,
हीरा - पन्ना ।

आशुतोष कुमार झा

Friday, 19 August 2011

सरकार की जय हो !!

आदेशानुसार

हथकड़ियाँ पहन ली  हैं
चिपका लिया है
मुँह पर टेप
पाँवों को बना दिया  है
अभ्यस्त
आदेशानुसार  ।

आप की हर बात
मानी जाएगी सरकार  ।

सर्वशक्तिमान सत्ता को
चुनौती देने वाले तमाम
लोगों की जमात
माँगती है आप से
रहम की भीख
दया के महासागर
हे ! करुणा के अवतार ।

बस एक इल्तिज़ा है हुज़ूर
रात आधी नींद
या सुबह की चाय पर
सत्ता की पीनक जब टूटे
आस-पास अंगरक्षकों का साया छूटे
एक बार सोचियेगा,
बिचारियेगा माइ -बाप
क्या आप के पास हैं--
सवा सौ करोड़ हथकड़ियाँ,
इतने लोगों के मुँह पर चिपकाने के लिये
टेप का भंडार ।

खल्क खुदा का,
मुल्क आप का--
माइ-बाप
हम सब कुछ सहने-करने को
हैं तैयार
आदेशानुसार ।

                       ------आशुतोष कुमार झा

Tuesday, 16 August 2011

अन्ना के नाम

कुछ शर्म करो, कुछ शर्म करो, ओ राज चलाने वालों  ।
कठपुतली  सी  जनता  को  तुम  सदा नचाने वालों ॥

लोकतंत्र  परिवारतंत्र  में  बदल  दिया  क्यों  तुमने  ?
भारत को जागीर पिता की  समझ लिया क्यों तुमने  ?

घृणा, द्वेष, अभिमान  की  भाषा  ऐसे  बोल  रहे हो  ।
गिरह  पाप  के  अपने-अपने  खुद  ही  खोल  रहे हो ॥

किस  मुँह  से  अपने  कर्मों  का  पर्दाफ़ाश  सहोगे   ?
बन  जाये  जनलोकपाल  तो  ज़द  में  तुम भी रहोगे ॥

इसलिये  देश  को  किया  पेश  तुमने  नायाब  नमूना ।
छोटे गाँधी  को  किया  बंद  तुम सबने  बिना  मुक़दमा॥

सुना चुके सिब्बल सब भाषण, दिग्गी का भी चुक गया राशन।
अण्णा  अपनी  बात  पे कायम, चलता रहा जेल में अनशन ॥

कोर्ट-कचहरी , लाठी-गोली , जेल-सलाखें  कितनी  देर    ।
जाग  चुकी  है  जनता  जब तो परिवर्तन में कितनी बेर ॥

उलगुलान  का  अब  है  नारा, अन्ना माथा मुकुट हमारा ।
राज  हमारा , ताज  हमारा , जनता का सारा  का  सारा ॥

परिवर्तन  की  लहर  चली , इस  बार  आर  या  पार  ।
हमीं   रहेंगे   देश   में   यारों   या   फ़िर  भ्रष्टाचार ॥

वादे  झूठे,  नीयत  खोटी,  तिस  पर दुश्मन सा व्यवहार।
ले  जनता  खुद  निर्णय,  सच्चे  अण्णा  या  सरकार  ॥




अन्ना को

लाल गुलाब

मैं
अन्ना को
अपने समर्थन के साथ
एक लाल गुलाब
देना चाहता हूँ
सुर्ख रंग और
मादक सुगंध के एहसास के साथ
हम धन्य हैं
कर्मयुग में आपके
साथ जन्म लिया
वर्ना हमारे बच्चों को
सचिन, शाहरूख, सलमान के बाद
अपना रोल मॉडल चुनने
सुदूर इतिहास में जाना पड़ता  ।

क्या पता,
कल इतिहास हमें माफ़ ना करे
मैंने तो तुम्हें
गाँधी और अगस्त का महीना
साथ-साथ दिया था
मगर कमज़र्फ़
तुम लोग मुझे
     "आज़ाद" हिंदोस्तान न दे सके  ।
और हम फ़ैज़ की नज़्म गुनगुनाते रह जायें--
’ये दाग़-दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर’
हाथ मलते, एक दूसरे की पेशानियाँ पढ़ते--

Sunday, 14 August 2011

आज़ादी का नया गीत

छह   दशकों  के  बाद  भी  चले  भूख  का  राज   |
किनको आज़ादी  मिली  विकट प्रश्न यह आज  | |
विकट  प्रश्न  यह  आज  तिरंगा  क्यों  फहराएँ   ?
किस  मुंह  से  हम  आज़ादी  का  जश्न  मनाएं ?
लाल  किले  से  भाषण   खूब  पिलाने   वालों   ?
 जनता  को  बहलाने  और  फुसलाने   वालों    ?
फिर   गांधी   की   आहट  पा  कर भौंक रहे हो ?
भगत   सिंह   की  गुर्राहट  पे  चौंक  रहे   हो   ?
इंक़लाब का बिगुल  बजाना  ही  होगा  चौराहों  पर  |
और नगाड़ा उलगुलान का सत्ता के गलियारों पर  ||

Wednesday, 10 August 2011

यशवंती रस

यशवंती रस टपका तो कोड़ा हुए निहाल |
खुली पोटली सत्य की जम कर मचा बवाल||
जम कर मचा बवाल माकन जी घबराये |
खूब  तरेरी  आँखें ,  भोंहें   खूब    नचाये ||
लेकिन चली न चाल घूस का भांडा फूटा |
सबने मिल कर झारखण्ड को इतना लूटा ||

Tuesday, 19 July 2011

एक ग़ज़ल

                           ग़ज़ल                                                                                         
इस  कदर  जर्रे  को  मत  ठुकराईये ।
हुक्मरानों की तरह मत पेश आईये ॥

हो अगर संजीदा तो दुश्मन भी काम का ।
मौका  पड़े  तो  दुश्मनी भी आज़माईये ॥

कांटों से ,ज़ख़्म से , सितम से टूटते नहीं ।
दुर्गम  हों  रास्ते  तभी भी मुस्कुराइये ॥

उठ जाए ना कहीं दोस्तों से ही यकीं।
ऐसे  न  दोस्ती  का  हक   जताईये ॥

प्यार में बंदिश नहीं  कोई मैं मानता ।
रूठिये बेशक मगर फिर मान जाईये ।।

ऐसे सवाल जिनसे बढ़ती हों उलझनें ।
मत पूछिये  थोड़ा  तो तरस खाईये ॥

मुंसिफ भी, मुजरिम भी दोनों हैं साथ-साथ ।
इंसाफ  का  तकाजा  अब  भूल  जाईये ।।

अब  इन्क़लाब मुमकिन  लगता नहीं मुझे ।
फिर राज घाट चलिये और भजन गाईये ॥


अपना था मुकद्दर जो, किसी गैर को सौंपा ।
सरकार बदलिये या खुद ही बदल जाईये ॥


      ----- आशुतोष कुमार झा

Saturday, 16 July 2011

एक और कविता

अपना इतिहास
मत सुनाओ मुझे    
आत्मा पर भाषण   
मत डराओ परमात्मा के नाम पर
सरग- नरक के झमेले में मत उलझाओ 
अपना ही आत्म-बल जगाओ
हिम्मत से काम लो,
आओ , श्रम के उचित मूल्य
और काम के घंटे पर बात करो ।

नहीं चाहता मैं
इतिहास की नाजायज़ औलाद बनना    
दिग्विजेताओं के जूते ढोना पसन्द नहीं                                              
सिंहासन की कठपुतलियों मे शामिल होना
मेरा स्वभाव नहीं ।
  
मुझे , नहीं तरना तीरथों की सीढ़ियाँ चढ़कर
नहीं होना पबित्तर 
अमृत सरोवर में डुबकी लगाकर ,
मुझे धरम-जात में मत लपेटो
ए चोंगे वाले ,
मेरे सामने से अपना धंधा समेटो
मेरे कान में मत फूंको मंतर,
दूर रखो कंठी - माला,
दे सकते हो तो.......
मुझे काम दो.......
मेरे हाथों को औज़ार दो.......

मैं आस्था के खंडहरों में भटकना नहीं चाहता,
परम-ज्ञान की अतल गहराइयों में
खोने का स्वांग भी
भरना नहीं चाहता ,
मैं खेतों , खलिहानों , कारखानों से लगकर
उनका ही होना चाहता हूँ ।

कितनी भी जहरीली हों राजनीति की लताएं
समझो, सहो और बदलो
बेशक, जले हुए हैं
मेरे ये हाथ दोनों
पर इस नाम पर चल रहे विमर्शों पर
मुझे भी खोलना है
अपना मुँह ।

मुझे रीढ़विहीन जंतु बनाकर
अपने बिलों में मत धकेलो
मत नचाओ अपने तर्ज की वीणा पर
दुग्ध-पात्र धरकर मत बहलाओ ।

मुझे नहीं सुनना अल्लाह का करम
मत गाओ रामधुन
यदि ज़बान है तो
महल और झोंपड़ी
रोटी और भू्ख
ऊँच और नीच से
भेद भरे समाज पर
उसे खोलो ।

तिजोरियों में कैद गरीबों की आह का हिसाब दो
गहनों से लदीं सुंदर मूर्तियों
पर सोने का चढ़ावा
चढ़ाते किसी मनुष्य विरोधी की तस्वीर मत दिखाओ,
अगर बताना ही है तो
मंदिरों के आगे
जुटने वाली भिखारियों की भीड़ का कारण समझाओ।

पहचानी है मैंने तुम्हारी चाल
हमें शतरंज की गोटियाँ मत बनाओ,
यदि हिम्मत है तो
श्रम के उचित मूल्य
और काम के घंटे पर बात करो ।

       -----आशुतोष कुमार झा








Thursday, 14 July 2011

इस देश का यारों क्या कहना

बम्बई में आखिर होता क्या है ????

एक धमाका सर ए आम 
कभी दोपहर ,कभी शाम 
सांसत में लोगों की जान 
मिला मीडियाको फिर काम 
खाकी का चैन हराम
 नेताओं का वही बयान
सब करवाए पाकिस्तान
सुनो साहिबों ,सुनियो जान 
बहुत खा चुके हम सब पान 
छर्रों की अब खुली दुकान 
प्योर मेड इन पाकिस्तान 
एक धमाका काम तमाम 
खा कर बोलो जय श्री राम 
मेरा भारत देश महान  ||

----- आशुतोष कुमार झा 

Sunday, 10 July 2011

सावन गीत


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Saturday, 9 July 2011

कवितायें

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नहीं जान पाया कब तुमने हृदय छुआ
नहीं जान पाया कब तुमसे प्रेम हुआ 

उचटा था मन ,
भर कर जीवन
आँखों की सरिता से तुमने
भीतर कहीं प्रवेश किया।

मीठा सा इक दर्द कहीं महसूस हुआ
नहीं जान पाया कब तुमसे प्रेम हुआ

बने पलक बिछौना ,
हुआ मुश्किल जीना
साँसों में भर कर सुवास ,
फूटा वसंत कब पहली बार

कब सावन की बूंदों का संस्पर्श हुआ
नहीं जान पाया कब तुमसे प्रेम हुआ

जैसे मोती हों लब पर ,
तू आई रहमत बन कर
नैय्या डगमग मझधार ,
बनीं तुम मेरी खेवनहार

कब तुम्हें सौंप कर खुद को मैं निश्चिन्त हुआ
नहीं  जान  पाया  कब  तुमसे  प्रेम  हुआ

कुछ छोटी कविताएं
इक प्रेम का कच्चा धागा ,
कुछ अल्फ़ाज़ों के मोती
पिरो दिया एक साथ ,
बन गया गीत नया

हर वसंत के बाद
ऊष्णता लील गयी फ़ूलों को,
सृजन का गंध बिखेर धरा पर
रज कण में मिल गयी पंखुरी।


किसे दूं ह्र्दय का पुष्प निराला ,
यौवन चाहे रंग - गंध , जगत
चाहता मादकता अनुपम , और
ज़ेब में भरी हुयी हो
माया की मधुशाला

दिवस के बाद विराम रात्रि,
गति का परिणाम रात्रि
तमस और ज्योति के पथ पर
जीवन का संधान रात्रि 

कदमों की आहट पहचानूँ
आँखों को जुगनू मैं मानू
तू मुझको माने माने
मैं तुझको रब जैसा मानूं

बस कदम बढ़ाना याद मुझे
चलते ही जाना याद मुझे
अपनी किस्मत अपने हाथों है यारों
रोज लकीरों को झुठलाना याद मुझे \

तेरी याद के बादल छंटेंगे
फिर विरह की धूप होगी
आसमाँ में चाँद - तारे
घर मेरे वीरानियाँ ही
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आशुतोष कुमार झा