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Monday, 3 October 2011

एक ग़ज़ल

इस  तरह  खुदगर्ज़ ना बन जाइए ।
माल बहुत है ज़रा धीरे-धीरे खाइए ॥

जल जाए दिल्ली या मुम्बई जाए दहल।
आप  अपनी-अपनी  रोटियाँ  पकाइए ॥

दर्द  होता है दिल का  दुश्मन हुज़ूर ।
हमारी दुश्वारियाँ दिल से न लगाइए ॥

कैसे  जाएगी  गुलदस्तों  की  रवायत ।
आप लीजिये और इन्हें भी दिलवाइए ॥

खेत-माटी, खाद-पानी, गाँव,  भारत-भारती ।
आप इण्डिया की सोचिये, शेष भूल जाइए ॥

सरकार के सालार,  पगड़ी में रहें, बेशक ।
अर्ज़ बस इतनी, हमें, टोपी मत पहनाइए ॥

सरकार चलाने का हुनर जानने वालों ।
पंजे को बक्शिये, थप्पड़ मत बनाइए ॥

हर पाँच साल बाद करती है फ़ैसला ।
जनता नहीं गूंगी,  मत  सितम ढ़ाइए ॥

आप ने समझा हमें गाफ़िल,  इनायत ।
कल का मेन्यू मैडम जी से पूछ आइए ॥

बर्बाद कर दिया चमन को बागबां ने खुद।
अब तो  कलियों  पे  ज़रा  तरस  खाइए ॥

      ---आशुतोष कुमार झा



 

एक ग़ज़ल

आपकी महफ़िल में आना चाहता हूँ ।
खुदगर्ज़  तनहाई भुलाना चाहता हूँ ॥

सर्द  मौसम  की  सुबह कांपते लब से ।
प्यार का गुनगुना गीत गाना चाहता हूँ ॥

शाख  से  टूट  कर  बिखर गया कैसे ।
एक पत्ते की दासताँ सुनाना चाहता हूँ ॥

बेड़ियाँ  मेरे  पाँवों की जानती हैं सबब ।
मैं आसमां के उस पार जाना चाहता हूँ ॥

लौट आए वफ़ा का मौसम तो  कहना ।
मैं इन्तज़ार का कोई बहाना चाहता हूँ ॥

पास  खंज़र  नहीं  तेरे  पर  सच  ये है ।
इन्हीं हाथों से कोई ज़ख्म खाना चाहता हूँ ॥

इश्क किसी से और कयामत किसी पर ।
मैं राहे वफ़ा का सच दिखाना चाहता हूँ ॥

तुम्हारी  हसरतों  के  पर, मेरा आसमाँ ।
मैं क्या कहूँ, कितना कमाना चाहता हूँ ॥

बया का घोंसला भी कम नहीं जन्नत से ।
मैं दरख़्त के साये में  ठिकाना चाहता हूँ ॥

किन हाथों दिल का साज़ रख दिया मैंने ।
उठती है टीस जब भी बजाना चाहता हूँ ॥

            --- आशुतोष कुमार झा