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Tuesday, 19 July 2011

एक ग़ज़ल

                           ग़ज़ल                                                                                         
इस  कदर  जर्रे  को  मत  ठुकराईये ।
हुक्मरानों की तरह मत पेश आईये ॥

हो अगर संजीदा तो दुश्मन भी काम का ।
मौका  पड़े  तो  दुश्मनी भी आज़माईये ॥

कांटों से ,ज़ख़्म से , सितम से टूटते नहीं ।
दुर्गम  हों  रास्ते  तभी भी मुस्कुराइये ॥

उठ जाए ना कहीं दोस्तों से ही यकीं।
ऐसे  न  दोस्ती  का  हक   जताईये ॥

प्यार में बंदिश नहीं  कोई मैं मानता ।
रूठिये बेशक मगर फिर मान जाईये ।।

ऐसे सवाल जिनसे बढ़ती हों उलझनें ।
मत पूछिये  थोड़ा  तो तरस खाईये ॥

मुंसिफ भी, मुजरिम भी दोनों हैं साथ-साथ ।
इंसाफ  का  तकाजा  अब  भूल  जाईये ।।

अब  इन्क़लाब मुमकिन  लगता नहीं मुझे ।
फिर राज घाट चलिये और भजन गाईये ॥


अपना था मुकद्दर जो, किसी गैर को सौंपा ।
सरकार बदलिये या खुद ही बदल जाईये ॥


      ----- आशुतोष कुमार झा

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