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Tuesday, 20 September 2011

विदा होते बरसात को

रस सिक्त 
कर गए 
हर रिक्त 
झमाझम बरसा कर 
संगीत  |
दिन गए विगत
अलसाए .....
कुम्हलाए प्रणय में बीत |


तुम आए
श्याम सखा बन कर
खेला नभ में जी भर
अंजुली न खाली छोड़ी
पत्तों - शाखों में 
मद - मदन्त
ज़बरन
अंकित किया
जलद का
चुम्बन अनंत |


भेजा अमोल उपहार
कृषक के जीवन में
अंकुर अशेष 
मल्हार |


अब विदा ले रहे
कहें, रुक जाओ
मत ही जाओ
बहुत बाकी हैं बातें
जन मन की
किन्तु यह हठ होगी |


पलकें देखेंगी राह
फिर अगले साल
आखेट पर आना
नव श्रृंगार कर के आना 
न चलेगा कोई बहाना
जल्दी ही आना
शुभ विदा प्रिय जलद - कुञ्ज










             ---- आशुतोष कुमार झा



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