There was an error in this gadget

Tuesday, 27 September 2011

गुनगुनाइए

एक गीत

ख्वाबों में अकसर बुनता था
हर्फ़ों   के   मोती   चुनता  था
गीत  वही  अपने  किस्से  का
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं ॥


सागर  तल  पर  रेती  बिखरे
नील गगन पर बादल निखरे
लहरों  का आना और जाना
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं॥


बरस  पुरानी  बात  हो  गई
चेहरे  पर   बरसात   हो  गई
कितनी कलियाँ,कितने पत्ते
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं॥


तनहा  रात  चली  आती  अब
छत पर अकसर सो जाती अब
तारों  से  तरकीबी  बातें
याद नहीं,कुछ याद नहीं॥


कमरा  खाली , मुँह  पर जाली
इस  उपवन  का  कोई न माली
कितने  पाँव  रौंद  कर  निकले
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं  ॥


किस  सूरज  को  याद   करूं
किस चन्दा से फ़रियाद करूं
आसमान कब गिरवी रक्खा
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं॥


हुस्न का मौसम फिर कर आया
रंग  एक  ना  मुझको  भाया
सोहबत में कितने दिल टूटे
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं॥



दिल जाने किस की याद में रोता
कौन  किसी  का  अपना  होता
लैला - हीर  के  झूठे  किस्से
याद  नहीं , कुछ  याद  नहीं॥


         ---आशुतोष कुमार झा














 

No comments:

Post a Comment